मानव दिमाग ऐसा होता है की वह हमेशा रोमांच की और भागता है। रोमांचक कहानियो में सबसे ज़्यादा लोग भूत प्रेत से जुडी कहानिया सुनना पसंद करते है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमने यहाँ सबसे ज़्यादा खतरनाक और भयंकर भूत प्रेत की 5 कहानिया प्रस्तुत की है।

यहाँ दर्शाई गयी भूति की कहानी को मात्र मनोरंजन के हेतु से निर्मित किया गया है। इन कहानियो का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। हालांकि ऐसे भूतो के अनुभव कही लोगो को हो चुके है। जिस वजह से आपको इसमें थोड़ा सच्चाई का स्पर्श भी नजर आ सकता है।
भूत प्रेत से जुडी टॉप 5 हॉरर कहानिया
ऐसा माना जाता है की जिन आत्माओ को मोक्ष प्राप्त नहीं होता या उनका पुनर्जन्म नहीं होता वह भूत के रूप में भटकती रहती है। यदि उनकी कोई इच्छा अधूरी रह जाये तो उससे पूर्ण करने की भी कोशिश में लगी रहती है। तो आइये दोस्तों आज की कहानी शुरू करते है।
13 नंबर कोठी: पिशाचिनी का खेल
यह कहानी कल्पनाशील परंतु वास्तविकता-सी सिहरन पैदा करने वाली है।
📍 स्थान: हिमाचल प्रदेश का एक बर्फीला गाँव
हर सर्दियों में यह गाँव बर्फ से ढँक जाता था। लेकिन एक कोठी थी। गाँव के सबसे सुदूर छोर पर “13 नंबर कोठी” जहाँ कभी कोई नहीं गया।
गाँव वालों का मानना था कि वहाँ समय नहीं चलता… घड़ी वहाँ जाकर बंद हो जाती है… आवाजें वहाँ जाकर बदल जाती हैं… और आत्माएँ वहाँ अकेली नहीं होतीं।
🏚️ कोठी का इतिहास
यह कोठी अंग्रेज़ों के ज़माने में बनी थी। 1896 में एक अंग्रेज़ डॉक्टर थॉमस एलन ने यह कोठी अपनी भारतीय पत्नी रूपाली के लिए बनवाई थी।
रूपाली बेहद सुंदर थी लेकिन तंत्र विद्या में रुचि रखती थी। गांव वाले कहते हैं कि रूपाली एक साध्वी नहीं, एक पिशाचिनी थी… जो जवान लड़कों की आत्माएं चुरा लेती थी।
एक दिन डॉक्टर एलन गायब हो गया, उसके बाद कोठी से हर रात चीखें आने लगीं।
🧳 मुख्य पात्र का प्रवेश – आरव, 2024
आरव, दिल्ली का एक शौकीन फोटोग्राफर और एक्सप्लोरर, हॉन्टेड प्लेसेस पर डॉक्युमेंट्री बनाता था। उसे सोशल मीडिया पर “भूत वाला लड़का” कहा जाता था।
एक दिन उसके हाथ एक पुराना नक्शा लगा जिसमें 13 नंबर कोठी का जिक्र था, और लिखा था:
“जो सत्य खोजता है, वो मृत्यु से ज़्यादा भयानक चीज़ से मिलेगा…”
आरव अकेले ही निकल पड़ा। दिसंबर की सर्द रात थी, कोहरा चारों ओर फैला हुआ। 3 दिन की ट्रेकिंग के बाद वह कोठी पहुँचा।
🔥 कोठी में पहला दिन
कोठी बाहर से जमी हुई थी लेकिन दरवाज़ा खुला… अंदर घुसते ही लगा जैसे कोई उसे देख रहा हो।
दीवारों पर पुराने तांत्रिक मंत्र, मटमैले कपड़ों से ढंकी आकृतियाँ… और एक बड़ा आईना जिस पर लिखा था:
“आईने में देखोगे तो खुद को नहीं, मुझे देखोगे…”
आरव ने जैसे ही कैमरा उठाया, एक औरत की परछाई उसके पीछे दिखाई दी — बाल ज़मीन तक, सफेद आँखें और पूरा चेहरा राख से भरा हुआ।
🌑 मध्यरात्रि – समय थम गया…
घड़ी में रात के 12:04 हुए… और रुक गई।
दरवाज़े अपने आप बंद हो गए
दीवारें धीरे-धीरे हिलने लगीं
और आईने में आरव ने खुद को नहीं, रूपाली को देखा…
उसने कहा:
“तू आया है? अच्छा किया… अब तेरी आत्मा मेरी होगी…”
आईना फूट गया। आरव ने भागना चाहा, लेकिन उसके पैरों के नीचे जमीन नहीं थी — वो किसी दूसरे आयाम में पहुँच चुका था — एक अंधेरी दुनिया जहां हर दिशा में केवल एक ही चेहरा था — रूपाली पिशाचिनी।
🩸 13 दरवाज़े – आत्मा की परीक्षा
अब आरव को अपनी आत्मा बचाने के लिए 13 दरवाज़ों से गुजरना था। हर दरवाज़ा एक नया डर:
पहला दरवाज़ा – माँ की आत्मा जो अब उसकी दुश्मन बन चुकी थी
दूसरा – एक कमरा जहाँ उसके ही शव को जलाया जा रहा था
तीसरा – उसका बचपन, लेकिन सबको उसके बिना ज़िंदा देखा
…
13वें दरवाज़े पर उसे एक विकल्प मिला
या तो रूपाली की जगह ले ले,
या हमेशा के लिए भूल जाए कि वह कौन था।
☠️ अंतिम निर्णय
आरव ने एक मंत्र पढ़ा जो उसने एक साधु से सीखा था — “ओं क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्ष:”
रूपाली चीख उठी। पूरा कोठी कांपने लगी।
लेकिन…
रूपाली की एक बात सच थी
“जो मेरी जगह लेगा, वो ही मुक्त करेगा…”
अब जब भी कोई “13 नंबर कोठी” के पास जाता है, तो उसे कोठी की खिड़की से एक युवक दिखता है — कैमरा हाथ में, मुस्कुराता हुआ… लेकिन उसकी आंखें अब इंसानों जैसी नहीं रहीं।
🔚 अंतिम पंक्ति
“रूपाली अब नहीं है… लेकिन ‘पिशाचिनी’ अब आरव बन गया है।”
“और अगली आत्मा… शायद तुम हो…”
कालपात्र – अंतिम ट्रेन की सवारी
यह एक काल्पनिक, पर दिल दहला देने वाली हॉरर कथा है जिसे पढ़ कर आपको रोमांच का अनुभव होता है।
🚂 प्रस्तावना
कहते हैं कि भारत में कई जगहें ऐसी हैं जहाँ टाइम और रियलिटी का कोई मतलब नहीं रह जाता। ऐसी ही एक जगह है —
“रामपुर स्टेशन”, जो अब सरकारी रिकॉर्ड में “निष्क्रिय स्टेशन” घोषित हो चुका है।
लेकिन वहां हर साल 31 अक्टूबर की रात, एक रहस्यमयी ट्रेन रुकती है — “कालपात्र एक्सप्रेस”
ये ट्रेन टिकट नहीं लेती… पैसे नहीं मांगती… बस आत्मा की कीमत लेती है।
🎥 मुख्य पात्र
नाम: प्रतीक शर्मा, उम्र 29, पत्रकार
स्थान: लखनऊ
प्रतीक को पुराने, अनसुलझे रहस्यों पर लिखने का जुनून था। एक दिन उसे एक बूढ़े पंडित ने चेताया:
“रामपुर स्टेशन पर मत जाना बेटे… वो कालपात्र की धरती है… वहाँ से जिसने भी चढ़ने की कोशिश की, वो कभी वापस इंसान नहीं रहा…”
प्रतीक को दिलचस्पी हुई, और उसने वहाँ जाने की योजना बनाई — 31 अक्टूबर, 2023 की रात।
🕛 रात 12:00 – ट्रेन का आना
चारों ओर घना कोहरा था। स्टेशन वीरान।
अचानक सीटी की आवाज़… और दूर से आती काली ट्रेन —
जिसके डिब्बों पर नाम था — “कालपात्र एक्सप्रेस”
ट्रेन एकदम पुरानी थी, जैसे 1940 के ज़माने की।
प्रतीक ने देखा डिब्बों में लोग नहीं, परछाइयाँ बैठी थीं… सबके चेहरे बिना आंखों के, बस अंधेरे में चमकती आकृतियाँ…
एक गेट अपने आप खुल गया।
ट्रेन के अंदर जाते ही दरवाज़े बंद हो गए।
🕯️ ट्रेन के डिब्बे – आत्माओं की सवारी
हर डिब्बा एक अलग भयावह सच्चाई को दर्शाता था:
पहला डिब्बा: स्कूल क्लासरूम, जहां प्रतीक ने देखा कि वह अपनी ही मौत की खबर पढ़ा रहा था।
दूसरा डिब्बा: एक शवगृह, जहां हर लाश उसकी ही शक्ल की थी।
तीसरा डिब्बा: एक सुनसान घर — और उसमें उसकी मां की आत्मा चीख रही थी:
“तू गया बेटा… तू अब कभी लौटेगा नहीं…”
प्रतीक पसीने में डूबा, चिल्लाता रहा। लेकिन ट्रेन चलती रही — सीटी बिना बजे… स्टेशन बिना रुके…
🩸 टिकट कलेक्टर – आत्मा का व्यापारी
एक बूढ़ा टिकट कलेक्टर आया, जिसकी आंखें शून्य थीं।
उसने कहा:
“इस ट्रेन में हर यात्री अपनी सबसे कीमती चीज़ देता है – अपनी पहचान।”
“अब तू कौन है, भूल जाएगा… तू क्या था, मिटा दिया जाएगा।”
प्रतीक ने भागने की कोशिश की लेकिन ट्रेन अब अंदर से बंद ब्रह्मांड बन चुकी थी — कोई खिड़की नहीं, कोई गेट नहीं।
☠️ ट्रेन का अंतिम स्टेशन – शून्यलोक
आख़िरकार ट्रेन रुकी — एक वीरान, धुंआधार स्टेशन पर जिसका नाम था — “शून्यलोक”
यहां उतरते ही प्रतीक को सैकड़ों आत्माएं दिखीं — जो कभी इंसान थीं… अब बस डर के आकार बन चुकी थीं।
वो सब एक साथ बोले:
“अब तू भी हम जैसा है… भूत… यात्री… कालपात्र का हिस्सा…”
🧧 एक साल बाद – 2024 की रिपोर्ट
रामपुर स्टेशन पर रेलवे ने जब एक पुराना CCTV रिकॉर्ड खंगाला, तो उसमें दिखा —
एक युवक ट्रेन में चढ़ता है, लेकिन… ट्रेन कभी आई ही नहीं थी।
अधिकारियों ने स्टेशन को “सदा के लिए बंद” घोषित कर दिया।
🔚 अंतिम पंक्तियाँ
“यदि आप कभी किसी सुनसान स्टेशन पर अकेले हों… और कोई पुरानी ट्रेन आपको अपने-आप बुलाए… तो कभी मत चढ़ना…”
“क्योंकि वो कालपात्र एक्सप्रेस हो सकती है… और आप उसकी अगली आत्मा…”
नरकसुर – श्मशान का तांत्रिक
एक श्रापित गाँव जिसमे एक मृत तांत्रिक और एक अमर आत्मा की दास्तान छिपी हुई है इसकी कहानी यहाँ दर्शाई है।
📍 स्थान: झारखंड का एक आदिवासी इलाका — नरकटवा गाँव
इस गाँव में लोग रात को घर से बाहर नहीं निकलते। यहाँ का श्मशान घाट कभी भी शांत नहीं रहता… वहाँ हर रात कोई न कोई चिल्लाता है, लेकिन कोई दिखाई नहीं देता।
कहा जाता है कि वहाँ एक तांत्रिक की आत्मा रहती है जिसका नाम था नरकसुर।
🧙🏻♂️ नरकसुर कौन था?
साल 1850 में, नरकटवा गाँव में एक तांत्रिक आया। वो गेरुआ कपड़ों में, माला पहने, पर उसकी आंखें काली थीं — पूरी तरह पुतलियों से खाली।
वो सिद्धि प्राप्त करना चाहता था — मृतकों को जीवित करने की विद्या।
उसने गाँव के श्मशान को अपना साधना-स्थल बना लिया।
लेकिन इसके लिए उसे चाहिए थे, 13 “जीवित आत्माओं” की बलि।
जब लोगों को पता चला, उन्होंने उसे पकड़ कर उसी श्मशान में ज़िंदा जला दिया।
मरते वक्त वह चिल्लाया:
“मैं फिर लौटूंगा… और हर जन्म में तुम्हारे वंशजों को जलाऊंगा… और इस श्मशान को नरक बना दूँगा…”
🕯️ कहानी की वर्तमान कड़ी: 2025
मुख्य पात्र: अन्वी, एक युवा फोटोजर्नलिस्ट, जो भारत के “भूतिया गाँवों” पर रिसर्च कर रही थी।
उसे “नरकटवा” के बारे में एक आदिवासी संत ने बताया।
“उस श्मशान में रात बिताना मौत से मिलना है, बेटी। वहाँ अब केवल नरकसुर की आत्मा नहीं, उसका भूतिया शरीर भी मौजूद है।”
अन्वी ने सब अनसुना कर दिया और रात में अकेले कैमरा लेकर श्मशान पहुँची।
🕛 रात 1:13 – साधना फिर शुरू
श्मशान में घुसते ही उसे सैकड़ों मटके दिखे — जिनमें राख और खोपड़ियाँ भरी थीं।
एक मटका अपने-आप घूमने लगा… और फिर वहाँ एक काला साया उठ खड़ा हुआ।
उसने कहा:
“तेरी आत्मा गर्म है… जीवित है… आखिरी बलि तू होगी…”
अन्वी ने भागना चाहा लेकिन श्मशान का हर रास्ता बदल चुका था — वो अब ज़मीन पर नहीं, किसी तांत्रिक मंडल के अंदर थी।
🧿 13वां बलिदान
नरकसुर ने अपनी चाकू जैसे नाखून से उसकी हथेली काटी। खून ज़मीन पर गिरते ही पुरानी राखें जल उठीं… और हर मटके से आत्माएं बाहर निकलने लगीं।
अन्वी ने किसी तरह अपने मोबाइल में रिकॉर्ड चालू किया और एक ताबीज जो उसकी दादी ने दिया था, सामने फेंक दिया।
ताबीज से तेज़ रोशनी निकली, और नरकसुर चिल्लाया:
“मैं मिटूंगा नहीं… मैं केवल सो जाऊँगा… अगली अमावस्या को फिर जागूँगा…”
📅 1 महीने बाद – रिपोर्ट
अन्वी को गांव के बाहर जंगल में अचेत पाया गया उसके पूरे शरीर पर भस्म से बने मंत्र खुदे हुए थे।
उसका मोबाइल मिला, लेकिन वीडियो फुटेज धुंधली और डरावनी थी
अजीब आकृतियाँ,
खून से सने पत्थर,
और एक विकृत चेहरा जो कैमरे की ओर देख रहा था नरकसुर का।
🔚 अंतिम चेतावनी
“श्मशान केवल मुर्दों के लिए होता है… लेकिन नरकटवा में मुर्दे भी चैन से नहीं सोते…”
“नरकसुर फिर आएगा… अगली अमावस्या को… और अगली बलि शायद…” _तुम हो
अंतिम गली – जहाँ वक्त मर चुका है
एक शहर, एक गलती और एक ऐसी गली, जो कभी किसी को वापस नहीं करती…
📍 स्थान: मध्यप्रदेश का एक पुराना शहर धौलागढ़
शहर की बाहरी सीमा पर एक गली है, जिसे लोग अब सिर्फ अकेले में याद करते हैं —
“अंतिम गली” – इसका कोई पता नहीं है, कोई गूगल मैप लोकेशन नहीं।
यह बस तभी प्रकट होती है जब कोई अपने जीवन से निराश होता है।
🧑💻 मुख्य पात्र: अद्वैत चौहान 34 वर्षीय गेम डेवलपर
अद्वैत की जिंदगी टूटी हुई थी। उसकी बीवी की आत्महत्या, कंपनी का नुकसान, और एक रहस्यमयी मेल:
“जवाब चाहिए? अंतिम गली से होकर गुज़र।”
(Time: 03:33 AM – Sender Unknown)
रात 3:33 पर वह बाहर निकला, और अंधेरे में एक गली प्रकट हुई —
इतनी संकरी, कि आदमी बमुश्किल सीधा चल सके, लेकिन भीतर से आती किसी की धीमी सी बुलाई हुई आवाज़ उसे खींच रही थी।
🌫️ अंदर की दुनिया – उल्टा समय, उल्टी दुनिया
जैसे ही अद्वैत उस गली में गया,
उसकी घड़ी उल्टी चलने लगी।
सड़कें ऊपर थीं और आसमान नीचे।
हर दरवाज़ा बंद, लेकिन हर खिड़की से कोई झांक रहा था — पर चेहरा इंसानी नहीं था।
हर मोड़ पर एक गली और, हर गली में वो खुद बैठा था —
एक जगह पर 5 साल पहले वाला खुद, दूसरी में बचपन वाला, एक में जो आत्महत्या कर चुका होता…
उसने समझा — यह गली विकल्प नहीं, पश्चाताप दिखाती है।
🩸 गली की आत्माएं – ‘पछतावे’ जो लौट नहीं सके
हर आत्मा जिसने अपनी गलती में डूब कर ‘अंतिम गली’ चुनी,
अब वहाँ स्थायी रूप से फंसी हुई थी।
एक बूढ़ी औरत फुसफुसाई:
“तू नया है… पर जल्द ही तू भी हमारी तरह गली का हिस्सा बन जाएगा।”
हर आत्मा एक जैसी लगती थी, खाली आंखें, मुंह से टपकता अंधेरा, और ज़मीन में धँसे पैर।
⌛ समय की कीमत – बाहर निकलने की शर्त
गली की आखिरी छोर पर एक दरवाज़ा था
लेकिन उस पर लिखा था:
“यहाँ से केवल वही निकल सकता है जो अपनी सबसे बड़ी सच्चाई स्वीकारे।”
अद्वैत समझ गया, उसने हमेशा अपनी पत्नी को दोष दिया था, लेकिन उसकी मौत का कारण उसका खुद का अवसाद था… उसकी बेरुख़ी थी।
जैसे ही उसने सच कुबूला, दरवाज़ा खुला।
🎬 लौटना… पर कुछ बदल चुका था
अद्वैत बाहर आया — लेकिन सब कुछ कुछ धीमा हो गया था…
उसकी उम्र 10 साल बढ़ चुकी थी।
लोग उसे पहचान नहीं पा रहे थे।
मोबाइल में कोई नंबर नहीं, किसी सोशल मीडिया पर उसका कोई नाम नहीं।
एक नोट उसके जेब में था:
“तू बच तो गया… पर वक्त ने तुझसे बदला लिया है…”
– अंतिम गली
🔚 अंतिम चेतावनी
“जब तुम्हें लगे कि जीवन खत्म हो रहा है… तो उस समय कोई रास्ता नज़र आए, तो रुक जाना… वो गली हो सकती है…”
“अंतिम गली – जहाँ वक्त मर चुका है… और आत्माएं खुद को निगल चुकी हैं…”
अशुभ पन्ने – लाइब्रेरी ऑफ द डेड
अब प्रस्तुत है एक और कल्पनाशील, बेहद डरावनी और अंत तक सस्पेंस से भरी हिंदी हॉरर कहानी, जो आपको डर और रहस्य की दुनिया में पूरी तरह डुबो देगी।
📍 स्थान: पश्चिम बंगाल का एक पुराना कस्बा — कालीगंज
यहाँ एक लाइब्रेरी थी — “राजराजेश्वरी सार्वजनिक पुस्तकालय”, जो 1871 से अब तक चली आ रही थी।
पुस्तकालय में लाखों किताबें थीं, पर एक अलमारी हमेशा ताले में बंद रहती थी — उस पर केवल एक चेतावनी:
“ये किताबें जीवितों के लिए नहीं हैं”
👩🎓 मुख्य पात्र: अर्पिता रॉय, 24 वर्षीय रिसर्च स्कॉलर,
कोलकाता यूनिवर्सिटी में “Pre-British Era Manuscripts” पर थीसिस कर रही थी।
वह एक दिन पुरानी पुस्तकों की खोज में कालीगंज पुस्तकालय पहुँची।
पुस्तकालय के केयरटेकर, एक बुढ़ा व्यक्ति हरिकाका, उसे देखकर बोला:
“सब कुछ देख सकती हो बिटिया… लेकिन लाल रंग के बक्से में मत झाँकना… वहाँ जो किताब है, वो किसी का नाम नहीं छोड़ती।”
लेकिन अर्पिता की जिज्ञासा ज़्यादा बड़ी थी…
📖 पुस्तक का नाम – “जिन्हें पढ़ा नहीं जाता”
उस लाल बक्से में एक किताब थी।
“न कंठे पठनीयम्” – संस्कृत में जिसका अर्थ है,
“जो पढ़ने के लिए नहीं बनी”
जैसे ही अर्पिता ने उसे खोला, चारों ओर की घड़ी रुक गई।
पन्ने हाथ में आने के साथ ही एक स्याह छाया कमरे में घूमने लगी।
पुस्तक के हर पन्ने पर किसी मरे हुए व्यक्ति की चीखों के शब्द थे।
और हर पन्ने के नीचे लिखा था:
“अब तुझे मेरी मौत पता है… अब तुझसे छूटकारा नहीं…”
🧟 अदृश्य पाठक – लाइब्रेरी की आत्माएं
उस रात से अर्पिता जब भी पढ़ने बैठती, उसे लगने लगा कोई पीछे खड़ा है।
कभी पन्ने अपने-आप पलट जाते, कभी दीवार पर कोई लाल स्याही से लिखा नाम उभरता
उसका नाम।
हर रात उसे किताब में एक नया नाम मिलता — जो अगले दिन की खबरों में मृत घोषित होता।
उसे समझ में आ गया — किताब मरने वालों के नाम पहले से बताती है… और आख़िरी नाम हमेशा पाठक का होता है।
📅 अंतिम पन्ना – और मृत्यु की तारीख
एक दिन अर्पिता ने पाया कि किताब का आख़िरी पन्ना अब तक कोरा था…
लेकिन धीरे-धीरे उस पर उसकी तारीख़-ए-मौत उभरने लगी
“04 नवंबर 2025”
उसने किताब जलाने की कोशिश की।
लेकिन किताब चिल्लाई, सचमुच…
हर पन्ने से आवाज़ आई,
“हम अब तेरे भीतर हैं… आग हमें जलाएगी नहीं, तुझे खा जाएगी…”
📍 कहानी का अंत या शुरुआत?
आज अर्पिता लापता है।
हरिकाका ने लाइब्रेरी को बंद करवा दिया।
लेकिन कभी-कभी कोई साहसी पाठक रात को दीवार पर यह वाक्य पढ़ता है:
“मैं अभी भी पढ़ रही हूँ…”
“अब अगला नाम किसका है?”
🔚 अंतिम चेतावनी
“हर किताब ज्ञान नहीं देती… कुछ किताबें शाप होती हैं…”
“और कुछ… तुम्हारी आत्मा लिखने के लिए खाली पन्ने ढूंढती हैं…”
आशा करती हु सबसे भयंकर भूत की कहानी आपको जरूर पसंद आयी होगी। पोस्ट पसंद आयी हो तो अन्य लोगो के साथ शेयर करना बिलकुल ना भूले।